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हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे | शाही शायरी
har dar-o-diwar pe larzan koi paikar lage

ग़ज़ल

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

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हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे
कितनी शक्लों का परी-ख़ाना हमारा घर लगे

दौड़ती जाएँ रगों में नील-गूँ ख़ामोशियाँ
दूर तक फैला हुआ यूँ धुँद का मंज़र लगे

बंद कमरे में बला-ए-जाँ है एहसास-ए-सुकूत
और बाहर हर तरफ़ आवाज़ का पत्थर लगे

जैसे जैसे टूटता जाए निगाहों का भरम
शख़्सियत अपनी भी अपने-आप को कम-तर लगे

काँप जाता है सदा-ए-दिल से सहरा-ए-सुकूत
और अपने पाँव की आहट से भी अब डर लगे

एक बे-मअ'नी तजस्सुस एक बे-मअ'नी ख़लिश
एक शोला सा लपकता जिस्म में अक्सर लगे