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हर-चंद सहारा है तिरे प्यार का दिल को | शाही शायरी
har-chand sahaara hai tere pyar ka dil ko

ग़ज़ल

हर-चंद सहारा है तिरे प्यार का दिल को

शोहरत बुख़ारी

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हर-चंद सहारा है तिरे प्यार का दिल को
रहता है मगर एक अजब ख़ौफ़ सा दिल को

वो ख़्वाब कि देखा न कभी ले उड़ा नींदें
वो दर्द कि उट्ठा न कभी खा गया दिल को

या साँस का लेना भी गुज़र जाना है जी से
या मारका-ए-इश्क़ भी इक खेल था दिल को

वो आएँ तो हैरान वो जाएँ तो परेशान
या-रब कोई समझाए ये क्या हो गया दिल को

सोने न दिया शोरिश-ए-हस्ती ने घड़ी भर
मैं लाख तिरा ज़िक्र सुनाता रहा दिल को

रूदाद-ए-मोहब्बत न रही इस के सिवा याद
इक अजनबी आया था उड़ा ले गया दिल को

जुज़ गर्द-ए-ख़मोशी नहीं 'शोहरत' यहाँ कुछ भी
किस मंज़िल-ए-आबाद में पहुँचा लिया दिल को