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हर-चंद कि वो जवाँ नहीं हम | शाही शायरी
har-chand ki wo jawan nahin hum

ग़ज़ल

हर-चंद कि वो जवाँ नहीं हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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हर-चंद कि वो जवाँ नहीं हम
इतने भी तो ना-तवाँ नहीं हम

क़ीमत है हमारी इक तबस्सुम
इस निर्ख़ पे कुछ गिराँ नहीं हम

हैं कुंज-ए-क़फ़स के रहने वाले
पर्वर्दा-ए-आशियाँ नहीं हम

क्यूँ दर पे रहें हमेशा बैठे
कुछ आप के पासबाँ नहीं हम

तस्वीर किसी की देखते हैं
महव-ए-गुल-ओ-बोस्ताँ नहीं हम

गर आँख ज़रा भी तू ने फेरी
तो गर्दिश-ए-आसमाँ नहीं हम

हाथों से तिरे बहार-ए-ख़ूबी
शर्मिंदा-ए-बर्ग-ए-पाँ नहीं हम

तुम तक भी पहुँच रहेंगे आख़िर
कुछ दूर तो हमरहाँ नहीं हम

किस रोज़ जराहतों पे दिल की
अश्कों से नमक-फ़िशाँ नहीं हम

मज्लिस से करे है हम को बाहर
गोया कि मिज़ाज-दाँ नहीं हम

साए से हमारे इतनी नफ़रत
काफ़िर भी तो ऐ बुताँ नहीं हम

है चार तरफ़ हमारा जल्वा
ढूँडे जो कोई कहाँ नहीं हम

यानी कि बरंग-ए-निकहत-ए-गुल
पर्दे में हैं और निहाँ नहीं हम

मिलता है हर इक से 'मुसहफ़ी' यार
समझे है कि बद-गुमाँ नहीं हम