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हमारी आँखों की पुतलियों में तिरा मुबारक मक़ाम हैगा | शाही शायरी
hamari aankhon ki putliyon mein tera mubarak maqam haiga

ग़ज़ल

हमारी आँखों की पुतलियों में तिरा मुबारक मक़ाम हैगा

सिराज औरंगाबादी

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हमारी आँखों की पुतलियों में तिरा मुबारक मक़ाम हैगा
पलक के पट हम ने खोल देखे तो ऐन माह-ए-तमाम हैगा

अरे शराब-ए-ख़िरद के कैफ़ी न कर तूँ दा'वा-ए-पुख़्ता-मग़ज़ी
मय-ए-मोहब्बत का जाम पी तूँ कि अब तलक ज़र्फ़ ख़ाम हैगा

ख़याल-ए-अबरू-ए-क़िबला-रूयाँ हुआ है मेहराब-ए-सज्दा-ए-दिल
नमाज़ शर्त-ए-नियाज़ की पढ़ सफ़-ए-जुनूँ का इमाम हैगा

अगरचे हर सर्व-ए-रास्त-क़ामत चमन में मग़रूर-ए-सर-कशी है
मुक़ाबिल इस क़द्द-ए-ख़ुश-अदा के मिरी नज़र में ग़ुलाम हैगा

'सिराज' इस शोअ'ला-रू सीं हरगिज़ गिला रवा नीं है आशिक़ों कूँ
तमाम जलती है शम्अ' हर शब अबस पतिंगों का नाम हैगा