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हमारा दिलबर-ए-गुलफ़म आया | शाही शायरी
hamara dilbar-e-gulfam aaya

ग़ज़ल

हमारा दिलबर-ए-गुलफ़म आया

सिराज औरंगाबादी

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हमारा दिलबर-ए-गुलफ़म आया
क़रार-ए-जान-ए-बे-आराम आया

कमंद-ए-पेच-ओ-ताब-ए-ज़ुल्फ़ कूँ खोल
शिकार-ए-दिल कूँ ले कर दाम आया

शिताबी होश कूँ सर सीं बदर कर
जुनूँ का मुझ तरफ़ पैग़ाम आया

करे ता-बुलबुल-ए-दिल कूँ ग़ज़ल-ख़्वाँ
बहार-ए-इश्क़ का हंगाम आया

ऐ ज़ाहिद भाग इस ज़ुल्फ़-ए-सियह सीं
ये काफ़िर दुश्मन-ए-इस्लाम आया

बिरह के महके सीं क़त्ल-ए-दिल पर
पियादा ग़म का ले एलाम आया

हुई जोश-ए-मोहब्बत सीं ज़बाँ बंद
सनम का दरमियाँ जब नाम आया

बला है तुझ निगह की सैफ़ का वार
दिल-ए-बेताब आख़िर काम आया

'सिराज' आने में उस जादू-नज़र के
शकेब ओ ताक़त ओ आराम आया