EN اردو
हम को तो इंतिज़ार-ए-सहर भी क़ुबूल है | शाही शायरी
hum ko to intizar-e-sahar bhi qubul hai

ग़ज़ल

हम को तो इंतिज़ार-ए-सहर भी क़ुबूल है

क़तील शिफ़ाई

;

हम को तो इंतिज़ार-ए-सहर भी क़ुबूल है
लेकिन शब-ए-फ़िराक़ तिरा क्या उसूल है

ऐ माह-ए-नीम-शब तिरी रफ़्तार के निसार
ये चाँदनी नहीं तिरे क़दमों की धूल है

काँटा है वो कि जिस ने चमन को लहू दिया
ख़ून-ए-बहार जिस ने पिया है वो फूल है

देखा था अहल-ए-दिल ने कोई सर्व-ए-नौ-बहार
दामन उलझ गया तो पुकारे बबूल है

बाक़ी है पौ फटे भी सितारों की रौशनी
शायद मरीज़-ए-शब की तबीअ'त मलूल है

जब मो'तबर नहीं था मिरा इश्क़-ए-बद-गुमाँ
अब हुस्न-ए-ख़ुद-फ़रोश का रोना फ़ुज़ूल है

लुट कर समझ रहे हैं कि नादिम है राहज़न
कितनी हसीन अहल-ए-मुरव्वत की भूल है