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हम भी शाएर थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं | शाही शायरी
hum bhi shaer the kabhi jaan-e-suKHan yaad nahin

ग़ज़ल

हम भी शाएर थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं

अहमद फ़राज़

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हम भी शाएर थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं
तुझ को भूले हैं तो दिल-दारी-ए-फ़न याद नहीं

दिल से कल महव-ए-तकल्लुम थे तो मालूम हुआ
कोई काकुल कोई लब कोई दहन याद नहीं

अक़्ल के शहर में आया है तो यूँ गुम है जुनूँ
लब-ए-गोया को भी बे-साख़्ता-पन याद नहीं

अव्वल अव्वल तो न थे वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-क़फ़स
और अब रस्म-ओ-रह-ए-अहल-ए-चमन याद नहीं

हर कोई नावक ओ तरकश की दुकाँ पूछता है
किसी गाहक को मगर अपना बदन याद नहीं

वक़्त किस दश्त-ए-फ़रामोशी में ले आया है
अब तिरा नाम भी ख़ाकम-ब-दहन याद नहीं

ये भी क्या कम है ग़रीब-उल-वतनी में कि 'फ़राज़'
हम को बे-मेहरी-ए-अर्बाब-ए-वतन याद नहीं