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हम भी हैं तिरे हुस्न के हैरान इधर देख | शाही शायरी
hum bhi hain tere husn ke hairan idhar dekh

ग़ज़ल

हम भी हैं तिरे हुस्न के हैरान इधर देख

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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हम भी हैं तिरे हुस्न के हैरान इधर देख
क्या आईना देखे है मिरी जान इधर देख

आँखें न चुरा मुझ से मिरी जान इधर देख
ऐ मैं तिरी इस चश्म के क़ुर्बान इधर देख

तरसूँ हूँ तिरी यक-निगह-ए-लुत्फ़ को प्यारे
इतना भी तो मुझ को न कड़ा मान इधर देख

आशिक़ तो हज़ारों ही ग़रज़ गुज़रे हैं लेकिन
यूँ चाक हुआ किस का गरेबान इधर देख

आँखें न चुरा 'मुसहफ़ी'-ए-रेख़्ता-गो से
इक उम्र से तेरा है सना-ख़्वान इधर देख