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है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | शाही शायरी
hai wasl hijr aalam-e-tamkin-o-zabt mein

ग़ज़ल

है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में

मिर्ज़ा ग़ालिब

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है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में
माशूक़-ए-शोख़ ओ आशिक़-ए-दीवाना चाहिए

उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

आशिक़ नाक़ाब-ए-जल्वा-ए-जानाना चाहिए
फ़ानूस-ए-शमा को पर-ए-परवाना चाहिए