EN اردو
है माह कि आफ़्ताब क्या है | शाही शायरी
hai mah ki aaftab kya hai

ग़ज़ल

है माह कि आफ़्ताब क्या है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

;

है माह कि आफ़्ताब क्या है
देखो तो तह-ए-नक़ाब क्या है

मैं ने तुझे तू ने मुझ को देखा
अब मुझ से तुझे हिजाब क्या है

आए हो तो कोई दम तो बैठो
ऐ क़िबला ये इज़्तिराब क्या है

उस बिन हमें जागते ही गुज़री
जाना भी न ये कि ख़्वाब क्या है

मुझ को भी गिने वो आशिक़ों में
इस बात का सो हिसाब क्या है

सीपारा-ए-दिल को देख उस ने
पूछा भी न ये किताब क्या है

इस मय-कदा-ए-जहाँ में यारो
मुझ सा भी कोई ख़राब क्या है

क़िस्मत में हमारी 'मुसहफ़ी' हाए
क्या जाने सवाब अज़ाब क्या है