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है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से | शाही शायरी
hai bazm-e-butan mein suKHan aazurda-labon se

ग़ज़ल

है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से

मिर्ज़ा ग़ालिब

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है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से
तंग आए हैं हम ऐसे ख़ुशामद-तलबों से

है दौर-ए-क़दह वज्ह-ए-परेशानी-ए-सहबा
यक-बार लगा दो ख़ुम-ए-मय मेरे लबों से

रिंदाना-ए-दर-ए-मय-कदा गुस्ताख़ हैं ज़ाहिद
ज़िन्हार न होना तरफ़ इन बे-अदबों से

बेदाद-ए-वफ़ा देख, कि जाती रही आख़िर
हर-चंद मिरी जान को था रब्त लबों से

क्या पूछे है बर-ख़ुद ग़लती-हा-ए-अज़ीज़ाँ
ख़्वारी को भी इक आर है अआली-नसबों से

गो तुम को रज़ा-जूई-ए-अग़्यार है लेकिन
जाती है मुलाक़ात कब ऐसे सबबों से

मत पूछ 'असद' वअ'दा-ए-कम-फ़ुर्सती-ए-ज़ीस्त
दो दिन भी जो काटे तू क़यामत तअबों से