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हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी | शाही शायरी
hasil se hath dho baiTh ai aarzu-KHirami

ग़ज़ल

हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी

मिर्ज़ा ग़ालिब

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हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
दिल जोश-ए-गिर्या में है डूबी हुई असामी

उस शम्अ की तरह से जिस को कोई बुझा दे
मैं भी जले-हुओं में हूँ दाग़-ए-ना-तमामी

करते हो शिकवा किस का तुम और बेवफ़ाई
सर पीटते हैं अपना हम और नेक-नामी

सद-रंग-ए-गुल कतरना दर-पर्दा क़त्ल करना
तेग़-ए-अदा नहीं है पाबंद-ए-बे-नियामी

तर्फ़-ए-सुख़न नहीं है मुझ से ख़ुदा-न-कर्दा
है नामा-बर को उस से दावा-ए-हम-कलामी

ताक़त फ़साना-ए-बाद अंदेशा शोला-ईजाद
ऐ ग़म हुनूज़ आतिश ऐ दिल हुनूज़ ख़ामी

हर चंद उम्र गुज़री आज़ुर्दगी में लेकिन
है शरह-ए-शौक़ को भी जूँ शिकवा ना-तमामी

है यास में 'असद' को साक़ी से भी फ़राग़त
दरिया से ख़ुश्क गुज़रे मस्तों की तिश्ना-कामी