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हासिल-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं | शाही शायरी
hasil-e-intizar kuchh bhi nahin

ग़ज़ल

हासिल-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं

शोहरत बुख़ारी

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हासिल-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं
या'नी अंजाम-कार कुछ भी नहीं

हसरत-ए-वस्ल के मुक़ाबिल में
कुल्फ़त-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं

दश्त में कुछ नहीं सराब तो है
बाग़ में गुल न ख़ार कुछ भी नहीं

किस से अपनी शनाख़्त लेते हो
आइना जुज़ ग़ुबार कुछ भी नहीं

दिल में झाँको मिरे अगर तो खुले
दामन-ए-तार तार कुछ भी नहीं

कौन हम से मिले कि पास अपने
जुज़ दिल-ए-दाग़दार कुछ भी नहीं

आ नफ़स दो नफ़स को मिल बैठें
साँस का ए'तिबार कुछ भी नहीं