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हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार है और | शाही शायरी
haal-e-dil-e-be-qarar hai aur

ग़ज़ल

हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार है और

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार है और
शायद कि ख़याल-ए-यार है और

ऐ दीदा न रो कि तुझ पर इक शब
रंज-ए-शब-ए-इंतिज़ार है और

जागा है कहीं मगर तू दी-शब
आँखों में तिरी ख़ुमार है और

फ़रहाद ने देखते ही गुलगूँ
जाना था कि ये सवार है और

कूचे में तिरे मिरी निगह का
हर गोशा उमीद-वार है और

है आख़िर-ए-उम्र इस चमन में
दो चार ही दिन बहार है और

नावक का तिरे शिकार-गह में
हर गोशे नया शिकार है और

वो हम से करे है कल का व'अदा
औरों से वहाँ क़रार है और

क्या लाले से निस्बत उस को सच है
दाग़-ए-दिल-ए-दाग़दार है और

औरों सा न जान मुझ को प्यारे
ये आशिक़-ए-जाँ-निसार है और

ऐ 'मुसहफ़ी' इस में चुप ही रह तू
सुनता है ये रोज़गार है और