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हर आँख में मस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए | शाही शायरी
ہر آنکھ میں مستی ہے کہیے بھی تو کیا کہیے

ग़ज़ल

हर आँख में मस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

अज़ीज़ वारसी

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हर आँख में मस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए
और आप की बस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

हर शय से किनारा भी और अंजुमन-आरा भी
क्या आप की हस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

बुत-ख़ाने में दिन काटा मयख़ाने में शब गुज़री
नशा है न मस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

ये दौर सनम-परवर हर शख़्स यहाँ आज़र
सहरा है न बस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

वो महफ़िल-ए-रिंदाँ हो या बज़्म-ए-सुख़न-दाँ हो
अहबाब-परस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

ज़ाहिद की सुबुक-फ़ितरत रिंदों पे हमेशा से
आवाज़ ही कसती कहिए भी तो क्या कहिए

अहबाब की आँखों में जो उन्स की नागिन है
अहबाब को डसती है कहिए भी तो क्या कहिए

इक जिंस-ए-कुदूरत थी जो पहले ही सस्ती थी
अब और भी सस्ती है कहिए भी तो क्या कहिए

दुनिया से 'अज़ीज़' उस को होती है मोहब्बत भी
दुनिया जिसे डसती है कहिए भी तो क्या कहिए