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गिला फ़ुज़ूल था अहद-ए-वफ़ा के होते हुए | शाही शायरी
gila fuzul tha ahd-e-wafa ke hote hue

ग़ज़ल

गिला फ़ुज़ूल था अहद-ए-वफ़ा के होते हुए

अहमद फ़राज़

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गिला फ़ुज़ूल था अहद-ए-वफ़ा के होते हुए
सो चुप रहा सितम-ए-ना-रवा के होते हुए

ये क़ुर्बतों में अजब फ़ासले पड़े कि मुझे
है आश्ना की तलब आश्ना के होते हुए

वो हीला-गर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें
चराग़ हम ने जलाए हवा के होते हुए

न चाहने पे भी तुझ को ख़ुदा से माँग लिया
ये हाल है दिल-ए-बे-मुद्दआ के होते हुए

न कर किसी पे भरोसा कि कश्तियाँ डूबें
ख़ुदा के होते हुए नाख़ुदा के होते हुए

मगर ये अहल-ए-रिया किस क़दर बरहना हैं
गलीम ओ दल्क़ ओ अबा ओ क़बा के होते हुए

किसे ख़बर है कि कासा-ब-दस्त फिरते हैं
बहुत से लोग सरों पर हुमा के होते हुए

'फ़राज़' ऐसे भी लम्हे कभी कभी आए
कि दिल-गिरफ़्ता रहे दिलरुबा के होते हुए