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ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं | शाही शायरी
ghazal mir ki kab paDhai nahin

ग़ज़ल

ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं

मीर तक़ी मीर

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ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं
कि हालत मुझे ग़श की आई नहीं

ज़बाँ से हमारी है सय्याद ख़ुश
हमें अब उम्मीद-ए-रिहाई नहीं

किताबत गई कब कि उस शोख़ ने
बना उस की गड्डी उड़ाई नहीं

नसीम आई मेरे क़फ़स में अबस
गुलिस्ताँ से दो फूल लाई नहीं

मिरी दिल-लगी उस के रू से ही है
गुल-ए-तर से कुछ आश्नाई नहीं

नविश्ते की ख़ूबी लिखी कब गई
किताबत भी एक अब तक आई नहीं

जुदा रहते बरसों हुए क्यूँकि ये
किनाया नहीं बे-अदाई नहीं

गिला हिज्र का सुन के कहने लगा
हमारे तुम्हारे जुदाई नहीं

सियह-तालई मेरी ज़ाहिर है अब
नहीं शब कि उस से लड़ाई नहीं