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गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग | शाही शायरी
gar tujhko hai yaqin-e-ijabat dua na mang

ग़ज़ल

गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग

मिर्ज़ा ग़ालिब

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गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
यानी बग़ैर-ए-यक-दिल-ए-बे-मुद्दआ न माँग

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग

ऐ आरज़ू शहीद-ए-वफ़ा ख़ूँ-बहा न माँग
जुज़ बहर-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिल दुआ न माँग

बरहम है बज़्म-ए-ग़ुंचा ब-यक-जुंबिश-ए-नशात
काशाना बस-कि तंग है ग़ाफ़िल हवा न माँग

मैं दूर गर्द-ए-अर्ज़-ए-रुसूम-ए-नियाज़ हूँ
दुश्मन समझ वले निगह-ए-आशना न माँग

यक-बख़्त औज नज़्र-ए-सुबुक-बारी-ए-'असद'
सर पर वबाल-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा न माँग