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गर हो तमंचा-बंद वो रश्क-ए-फ़िरंगियाँ | शाही शायरी
gar ho tamancha-band wo rashk-e-firangiyan

ग़ज़ल

गर हो तमंचा-बंद वो रश्क-ए-फ़िरंगियाँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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गर हो तमंचा-बंद वो रश्क-ए-फ़िरंगियाँ
बाँके मुग़ल बचे न करें ख़ाना-जंगियाँ

शोख़ी-मिज़ाज उस के से अब तक गई नहीं
वैसे ही बाँकपन हैं वही ग़ोला-दंगियाँ

बुलबुल के अश्क-ए-सुर्ख़ ने ये क्या ग़ज़ब किया
जो तीलियाँ क़फ़स की सभी ख़ूँ में रंगियाँ

गर्दूं अगरचे दिन को ग़ज़ाल-ए-सियाह है
पर शब को मेरे साथ करे है पलंगियाँ

देखा न होगा वो कभी 'बेज़न' ने चाह में
जो दिन मुझे दिखाती हैं क़िस्मत की तंगियाँ

आरिज़ पे तेरे जोशिश-ए-ख़त्त-ए-सियाह है
या रोम पर चढ़ आई है ये फ़ौज-ए-ज़ंगियाँ

क्या जाने किस से बिगड़ी है दरिया में 'मुसहफ़ी'
लहरों के हाथों में हैं जो तलवारें नंगियाँ