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गर भला मानस है तो ख़ंदों से तू मिल मिल न हँस | शाही शायरी
gar bhala manas hai to KHandon se tu mil mil na hans

ग़ज़ल

गर भला मानस है तो ख़ंदों से तू मिल मिल न हँस

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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गर भला मानस है तो ख़ंदों से तू मिल मिल न हँस
मुस्कुरा जूँ ग़ुंचा पर गुल की तरह खिल खिल न हँस

रो रुवा चाहे जता रोने से जा है दिल से दंग
ज़ंग हो है दिल उपर हँसने से आ ऐ दिल न हँस

तू हँसे है मौत को और मौत हँसती है तुझे
मौत को हँसना नहीं है ख़ूब ऐ ग़ाफ़िल न हँस

अक़्ल से है दूर हँसना दम-ब-दम आक़िल के तईं
अक़्ल है तू तो किसी बे-अक़्ल पर आक़िल न हँस

हँस जता चाहे अकेला हँस तू दीवाने की तरह
पर हँसी में तू किसी हँसते से हो शामिल न हँस

जो हँसी है और को उस ने हँसाया आप को
इस हँसी में कुछ नहीं हासिल है बे-हासिल न हँस

हँसते हँसते में कई के घर लगे हैं खालसे
ज़ब्त कर अपनी हँसी 'हातिम' तू अब यक तिल न हँस