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ग़म-ए-जहाँ के फ़साने तलाश करते हैं | शाही शायरी
gham-e-jahan ke fasane talash karte hain

ग़ज़ल

ग़म-ए-जहाँ के फ़साने तलाश करते हैं

शकील बदायुनी

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ग़म-ए-जहाँ के फ़साने तलाश करते हैं
ये फ़ित्ना-गर तो बहाने तलाश करते हैं

रबाब-ए-अम्न-ओ-सुकूँ के हसीन तारों में
शिकस्त-ए-दिल के तराने तलाश करते हैं

ये इंतिहा है जुनून-ए-हवस-परस्ती की
पराए घर में ख़ज़ाने तलाश करते हैं

नए निज़ाम की बुनियाद तोड़ने वाले
वफ़ा-शिआ'र पुराने तलाश करते हैं

सितम-नवाज़ दिलों को जो साज़गार न हो
'शकील' हम वो ज़माने तलाश करते हैं