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ग़म-ए-आहिस्ता-रौ याँ रफ़्ता रफ़्ता | शाही शायरी
gham-e-ahista-rau yan rafta rafta

ग़ज़ल

ग़म-ए-आहिस्ता-रौ याँ रफ़्ता रफ़्ता

सिराज औरंगाबादी

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ग़म-ए-आहिस्ता-रौ याँ रफ़्ता रफ़्ता
किया है मुझ कूँ हैराँ रफ़्ता रफ़्ता

वो साहिर ने अदा का सेहर कर कर
लिया मुझ सीं दिल-ओ-जाँ रफ़्ता रफ़्ता

जिगर उश्शाक़ का दाग़-ए-जफ़ा सूँ
हुआ सेहन-ए-गुलिस्ताँ रफ़्ता रफ़्ता

कमंद-ए-ज़ुल्फ़ दिखला कर किया है
मिरे दिल कूँ परेशाँ रफ़्ता रफ़्ता

ज़ि-बस उस यूसुफ़-ए-मिस्री के हैं लब
हुआ दिल मिस्ल-ए-कनआँ रफ़्ता रफ़्ता

'सिराज' अब तू न हो ग़मगीं कि रहमाँ
करेगा मुश्किल आसाँ रफ़्ता रफ़्ता