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ग़ैर के घर तू न रह रात को मेहमान कहीं | शाही शायरी
ghair ke ghar tu na rah raat ko mehman kahin

ग़ज़ल

ग़ैर के घर तू न रह रात को मेहमान कहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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ग़ैर के घर तू न रह रात को मेहमान कहीं
ता ना इस बात का चर्चा हो मिरी जान कहीं

अब तलक ग़ुंचे की गर्दन है झुकी ख़जलत से
उस ने देखी थी तिरी गुए-गिरेबान कहीं

राज़-ए-दिल उस से कहा मैं तो वले ये डर है
कि मिरे राज़ को कह दे न वो नादान कहीं

ऐ परेशानी-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम-ए-काफ़िर-ए-केश
कीजियो तू न मिरे दिल को परेशान कहीं

दिल की बेचैनी से मैं सख़्त ब-तंग आया हूँ
चैन पड़ता ही नहीं है इसे इक आन कहीं

धानी जोड़े ने तिरे खेत रखा है मुझ को
सब्ज़ रंग इतने तो देखे नहीं हैं धान कहीं

मनअ किस वास्ते करता है मैं तेरे सदक़े
ईद के दिन तो मुझे होने दे क़ुर्बान कहीं

दर्द-ए-दिल जा के मैं कह लूँ अभी दर के नज़दीक
एक साअत को ही उठ जावे जो दरबान कहीं

'मुसहफ़ी' एक ग़ज़ल और भी मैं लिखता हूँ
ये तो बैतें कई मैं ने बहुत आसान कहीं