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फ़राज़-ए-बे-ख़ुदी से तेरा तिश्ना-लब नहीं उतरा | शाही शायरी
faraaz-e-be-KHudi se tera tishna-lab nahin utra

ग़ज़ल

फ़राज़-ए-बे-ख़ुदी से तेरा तिश्ना-लब नहीं उतरा

क़तील शिफ़ाई

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फ़राज़-ए-बे-ख़ुदी से तेरा तिश्ना-लब नहीं उतरा
अभी तक उस की आँखों से ख़ुमार-ए-शब नहीं उतरा

ज़रा मैं सोच लूँ क्या काम उस को आ पड़ा मुझ से
कभी वो बाम-ए-तन्हाई से बे-मतलब नहीं उतरा

मिरी पुर्सिश को आ पहुँचा हसीं बंदा कोई वर्ना
फ़लक से आज तक मेरी मदद को रब नहीं उतरा

सितारा सा नज़र आता है ऊपर से जहाँ पानी
मैं ख़ुश-फ़हमी के इस गहरे कुएँ में कब नहीं उतरा

पशेमानी के बा'द उस को गिराऊँ कैसे नज़रों से
कि जब वो बेवफ़ा था मेरे दिल से तब नहीं उतरा

कभी सरताज मुझ बे-ताज को सहवन कहा उस ने
अभी तक मेरे सर से नश्शा-ए-मंसब नहीं उतरा

तमन्ना है कि छेड़ूँ नग़्मा-ए-इंसानियत लेकिन
'क़तील' अब तक मिरे आ'साब से मज़हब नहीं उतरा