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फ़जर उठ यार का दीदार करनाँ | शाही शायरी
fajar uTh yar ka didar karnan

ग़ज़ल

फ़जर उठ यार का दीदार करनाँ

सिराज औरंगाबादी

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फ़जर उठ यार का दीदार करनाँ
शब-ए-हिज्राँ का दुख इज़हार करनाँ

अगर साबित है ऐ दिल कुफ़्र में तूँ
क़यामत में यही इक़रार करनाँ

कहा यूँ खोल कर ज़ुल्फ़ों कूँ सय्याद
किसी वहशी कूँ अपना यार करनाँ

तसव्वुर में तिरे ऐ मज़हर-ए-रब
तमाशा-ए-दर-ओ-दीवार करनाँ

तुझे सौगंद अपने चाहते की
कि अपने चाहते पर प्यार करनाँ

न कहनाँ ख़ूब है तुझ ज़ुल्फ़ की बात
अबस हर तार का बिस्तार करनाँ

'सिराज' अब इश्क़ की परवानगी है
कि सैर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार करनाँ