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दिलबरी हर बुल-हवस की हद सीं अफ़्ज़ूँ मत करो | शाही शायरी
dilbari har bul-hawas ki had sin afzun mat karo

ग़ज़ल

दिलबरी हर बुल-हवस की हद सीं अफ़्ज़ूँ मत करो

सिराज औरंगाबादी

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दिलबरी हर बुल-हवस की हद सीं अफ़्ज़ूँ मत करो
मुफ़लिस-ए-बे-कद्र कूँ यक-पल में क़ारूँ मत करो

मत चढ़ाओ आस्तीं तुम क़त्ल करने पर मिरे
अपने दामन कूँ अबस आलूदा-ए-ख़ूँ मत करो

मेहरबानी की तरह पहली न भूलो यक-ब-यक
बैत-ए-अबरू कूँ तुम अपनी ताज़ा मज़मूँ मत करो

लज़्ज़त-ए-मस्ती अगर दिल कूँ तुम्हारे है अज़ीज़
जब तलक दीवाना हुए तब लग फ़लातूँ मत करो

अपने आशिक़ कूँ दिखाओ जल्वा-ए-ईमाँ-फ़रेब
अक़्ल की रखता है बू ज़ाहिद कूँ मजनूँ मत करो

कर दिए हैं आशिक़ों ने ख़ून अपने कूँ सबील
पंजा-ए-नाज़ुक कूँ मेहंदी लाला गुलगूँ मत करो

छोड़ दियो ता-आतिश-ए-हसरत में जल कर ख़ाक होए
लाशा-ए-आशिक़ कूँ मरने बा'द मदफ़ूँ मत करो

आशिक़ों कूँ इस दो-बाला कैफ़ की बर्दाश्त नईं
ख़त की सब्ज़ी लब की शक्कर साथ मा'जूँ मत करो

ख़ुद-बख़ुद बे-ख़ुद हुआ है देख कर तुम कूँ 'सिराज'
इस क़दर नाज़-ओ-अदा का सेहर-ओ-जादू मत करो