दिलबरी हर बुल-हवस की हद सीं अफ़्ज़ूँ मत करो
मुफ़लिस-ए-बे-कद्र कूँ यक-पल में क़ारूँ मत करो
मत चढ़ाओ आस्तीं तुम क़त्ल करने पर मिरे
अपने दामन कूँ अबस आलूदा-ए-ख़ूँ मत करो
मेहरबानी की तरह पहली न भूलो यक-ब-यक
बैत-ए-अबरू कूँ तुम अपनी ताज़ा मज़मूँ मत करो
लज़्ज़त-ए-मस्ती अगर दिल कूँ तुम्हारे है अज़ीज़
जब तलक दीवाना हुए तब लग फ़लातूँ मत करो
अपने आशिक़ कूँ दिखाओ जल्वा-ए-ईमाँ-फ़रेब
अक़्ल की रखता है बू ज़ाहिद कूँ मजनूँ मत करो
कर दिए हैं आशिक़ों ने ख़ून अपने कूँ सबील
पंजा-ए-नाज़ुक कूँ मेहंदी लाला गुलगूँ मत करो
छोड़ दियो ता-आतिश-ए-हसरत में जल कर ख़ाक होए
लाशा-ए-आशिक़ कूँ मरने बा'द मदफ़ूँ मत करो
आशिक़ों कूँ इस दो-बाला कैफ़ की बर्दाश्त नईं
ख़त की सब्ज़ी लब की शक्कर साथ मा'जूँ मत करो
ख़ुद-बख़ुद बे-ख़ुद हुआ है देख कर तुम कूँ 'सिराज'
इस क़दर नाज़-ओ-अदा का सेहर-ओ-जादू मत करो
ग़ज़ल
दिलबरी हर बुल-हवस की हद सीं अफ़्ज़ूँ मत करो
सिराज औरंगाबादी

