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दिलबर की तमन्ना-ए-बर-ओ-दोश में मर जाए | शाही शायरी
dilbar ki tamanna-e-bar-o-dosh mein mar jae

ग़ज़ल

दिलबर की तमन्ना-ए-बर-ओ-दोश में मर जाए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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दिलबर की तमन्ना-ए-बर-ओ-दोश में मर जाए
क्या यूँही कोई हसरत-ए-आग़ोश में मर जाए

क़ब्र उस की पे लाज़िम है ख़ुम-ए-मय का चढ़ाना
जो मस्त कि इश्क़-ए-बुत-ए-मय-नोश में मर जाए

है तरफ़ा अज़िय्यत कोई किस तरह ख़ुदाया
याद-ए-सनम-ए-वादा-फ़रामोश में मर जाए

सरगोशी की रुख़्सत न कभी ग़ैर को देना
गर वो हवस-ए-ज़ुल्फ़ ओ बना-गोश में मर जाए

गर ग़ुंचा-ए-मह्जूब तिरी वज़्अ को देखे
अंदाज़-ए-हया-ए-लब-ए-ख़ामोश में मर जाए

अल्लाह-रे बुर्क़ा तिरा और उस के ये रौज़न
देखे जो छुपा यूँ तुझे रू-पोश में मर जाए

क्या फ़ाएदा फूलों की छड़ी उस पे लगाना
ऐ गुल जो तिरी एक ही पा-पोश में मर जाए

या-रब न वो दिन उस के तू आशिक़ को दिखाना
माशूक़ के आते ही जो आग़ोश में मर जाए

आता है मुझे 'मुसहफ़ी' दिल अपने पे रोना
अफ़सोस है यूँ ग़श से वो आ होश में मर जाए