दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निकू न गया
झाँकना-ताकना कभू न गया
हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया
सब गए होश ओ सब्र व ताब ओ तवाँ
लेकिन ऐ दाग़ दिल से तू न गया
दिल में कितने मुसव्वदे थे वले
एक पेश उस के रू-ब-रू न गया
सुब्हा-गर्दां ही 'मीर' हम तो रहे
दस्त-ए-कोताह ता-सुबू न गया
ग़ज़ल
दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निकू न गया
मीर तक़ी मीर

