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दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निकू न गया | शाही शायरी
dil se shauq-e-ruKH-e-niku na gaya

ग़ज़ल

दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निकू न गया

मीर तक़ी मीर

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दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निकू न गया
झाँकना-ताकना कभू न गया

हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया

सब गए होश ओ सब्र व ताब ओ तवाँ
लेकिन ऐ दाग़ दिल से तू न गया

दिल में कितने मुसव्वदे थे वले
एक पेश उस के रू-ब-रू न गया

सुब्हा-गर्दां ही 'मीर' हम तो रहे
दस्त-ए-कोताह ता-सुबू न गया