दिल में मुर्ग़ान-ए-चमन के तो गुमाँ और ही है
पर दिल-ए-ज़ार का अंदाज़-ए-फ़ुग़ाँ और ही है
क़द-ए-नौ-ख़ेज़ नहीं आफ़त-ए-जाँ और ही है
जिस पे दिल अपना गया है वो जवाँ और ही है
हम जहाँ रहते हैं यारो वो जहाँ और ही है
वो जगह और ही है और वो मकाँ और ही है
शफ़क़ी रंग पे मत भूलियो अपने ऐ अब्र
चश्म-ए-ख़ुश्क और मिज़ा-ए-अश्क-फ़िशाँ और ही है
बदन आग़ुशता-ब-ख़ूँ होने पे मौक़ूफ़ नहीं
ज़ख़्मी-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ का निशाँ और ही है
गो कि औरों की हुईं सुरमे से आँखें रौशन
सुर्मा-ए-बीनिश-ए-साहिब-नज़राँ और ही है
गरचे रखते हैं नज़ाकत ये सभी मू-कमराँ
वो नज़ाकत है जुदी और वो मियाँ और ही है
'मुसहफ़ी' गरचे ये सब कहते हैं हम से बेहतर
अपनी पर रेख़्ता-गोई की ज़बाँ और ही है
ग़ज़ल
दिल में मुर्ग़ान-ए-चमन के तो गुमाँ और ही है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

