दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है
दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है
ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे
बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है
नक़्श-ए-उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या
ज़िंदगी रक़्स-गह-ए-रेग-ए-रवाँ होती है
जो तिरे हुस्न-ए-नज़र-गीर से शादाब नहीं
उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है
वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई
जब मोहब्बत भी तबीअ'त पे गराँ होती है
यूँ भी होती है तिरे ग़म की नवाज़िश अक्सर
लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है
जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए-मोहब्बत लेकिन
देखना ये है कि तकमील कहाँ होती है
हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं
हम-नशीनों में तिरी बात जहाँ होती है
चौंक उठता है ग़म-ए-हिज्र का एहसास 'रिशी'
उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है
ग़ज़ल
दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है
ऋषि पटियालवी

