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दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है | शाही शायरी
dil ki rudad nigahon se bayan hoti hai

ग़ज़ल

दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है

ऋषि पटियालवी

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दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है
दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है

ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे
बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है

नक़्श-ए-उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या
ज़िंदगी रक़्स-गह-ए-रेग-ए-रवाँ होती है

जो तिरे हुस्न-ए-नज़र-गीर से शादाब नहीं
उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है

वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई
जब मोहब्बत भी तबीअ'त पे गराँ होती है

यूँ भी होती है तिरे ग़म की नवाज़िश अक्सर
लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है

जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए-मोहब्बत लेकिन
देखना ये है कि तकमील कहाँ होती है

हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं
हम-नशीनों में तिरी बात जहाँ होती है

चौंक उठता है ग़म-ए-हिज्र का एहसास 'रिशी'
उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है