दिल जलता है शाम सवेरे
एक चराग़ और लाख अँधेरे
भीगी पलकें नींद से ख़ाली
चैन के दुश्मन रैन-बसेरे
लोग समझते हैं सौदाई
प्यार ने अपने भी दिन फेरे
अपना अपना दर्द है वर्ना
किस की गलियाँ कैसे फेरे
उन का वो मासूम तबस्सुम
जैसे कोई फूल बिखेरे
ए ग़म-ए-दौराँ ए ग़म-ए-जानाँ
दिल है एक सितम बहुतेरे
कैसे पहुँचे नींद आँखों तक
बैठा है दिल रस्ता घेरे
तू ही बता ये दर्द है कैसा
पलकें मेरी आँसू तेरे
ग़ज़ल
दिल जलता है शाम सवेरे
क़तील शिफ़ाई

