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दिल जलता है शाम सवेरे | शाही शायरी
dil jalta hai sham sawere

ग़ज़ल

दिल जलता है शाम सवेरे

क़तील शिफ़ाई

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दिल जलता है शाम सवेरे
एक चराग़ और लाख अँधेरे

भीगी पलकें नींद से ख़ाली
चैन के दुश्मन रैन-बसेरे

लोग समझते हैं सौदाई
प्यार ने अपने भी दिन फेरे

अपना अपना दर्द है वर्ना
किस की गलियाँ कैसे फेरे

उन का वो मासूम तबस्सुम
जैसे कोई फूल बिखेरे

ए ग़म-ए-दौराँ ए ग़म-ए-जानाँ
दिल है एक सितम बहुतेरे

कैसे पहुँचे नींद आँखों तक
बैठा है दिल रस्ता घेरे

तू ही बता ये दर्द है कैसा
पलकें मेरी आँसू तेरे