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देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे | शाही शायरी
dekh kar dar-parda garm-e-daman-afshani mujhe

ग़ज़ल

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे

मिर्ज़ा ग़ालिब

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देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
कर गई वाबस्ता-ए-तन मेरी उर्यानी मुझे

बन गया तेग़-ए-निगाह-ए-यार का संग-ए-फ़साँ
मर्हबा मैं क्या मुबारक है गिराँ-जानी मुझे

क्यूँ न हो बे-इल्तिफ़ाती उस की ख़ातिर जम्अ है
जानता है महव-ए-पुर्सिश-हा-ए-पिन्हानी मुझे

मेरे ग़म-ख़ाने की क़िस्मत जब रक़म होने लगी
लिख दिया मिन-जुमला-ए-असबाब-ए-वीरानी मुझे

बद-गुमाँ होता है वो काफ़िर न होता काश के
इस क़दर ज़ौक़-ए-नवा-ए-मुर्ग़-ए-बुस्तानी मुझे

वाए वाँ भी शोर-ए-महशर ने न दम लेने दिया
ले गया था गोर में ज़ौक़-ए-तन-आसानी मुझे

वअ'दा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
तुम ने क्यूँ सौंपी है मेरे घर की दरबानी मुझे

हाँ नशात-ए-आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी वाह वाह
फिर हुआ है ताज़ा सौदा-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे

दी मिरे भाई को हक़ ने अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी
मीरज़ा यूसुफ़ है 'ग़ालिब' यूसुफ़-ए-सानी मुझे