EN اردو
दर तलक आ के टुक आवाज़ सुना जाओ जी | शाही शायरी
dar talak aa ke Tuk aawaz suna jao ji

ग़ज़ल

दर तलक आ के टुक आवाज़ सुना जाओ जी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

;

दर तलक आ के टुक आवाज़ सुना जाओ जी
अपने मुश्ताक़ को इतना भी न तरसाओ जी

ग़ैर के साथ से भागे है मुझे देख तो मैं
उस से कहता हूँ कि उस को तुम्ही ठहराओ जी

मैं जो इक रोज़ बुलाया उन्हें घर जाते देख
पास आ बैठ के कहने लगे फ़रमाओ जी

शाना क्या ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ में करो हो बैठे
अपने उलझे हुए बालों को तो सुलझाओ जी

ज़ानू-ए-ग़ैर पे शब सर न रखा था तुम ने
जाओ झूटी न मिरे सर की क़सम खाओ जी

मुझ से क्या पूछो हो क्या जी में तिरे है सच कह
है जो कुछ जी में मिरे तुम ही समझ जाओ जी

रात अँधेरी है चले आओ मिरे घर छुप कर
आ के फिर चाँद सा मुखड़ा मुझे दिखलाओ जी

इश्क़ में होते हैं म्याँ-'मुसहफ़ी' सौ तरह के ग़म
गो ग़म-ए-हिज्र है इतना भी न घबराओ जी