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दम ग़नीमत है कि वक़्त-ए-ख़ुश-दिली मिलता नहीं | शाही शायरी
dam ghanimat hai ki waqt-e-KHush-dili milta nahin

ग़ज़ल

दम ग़नीमत है कि वक़्त-ए-ख़ुश-दिली मिलता नहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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दम ग़नीमत है कि वक़्त-ए-ख़ुश-दिली मिलता नहीं
ये समाँ ये चैन दुनिया में कभी मिलता नहीं

देखियो नफ़रत कि मेरा नाम गर लेवे कोई
रू-ब-रू उस के, तो फिर वो उस से भी मिलता नहीं

क्या करूँ नासाज़ी-ए-ताले'अ का मैं शिकवा कि आह
जिस को जी चाहे है मेरा उस का जी मिलता नहीं

खो के मुझ को हाथ से सुनते हो पछताओगे तुम
मानो कहना भी कि मुझ सा आदमी मिलता नहीं

किस तरफ़ जाता रहा क्या जाने वो वहशी-मिज़ाज
ढूँडते फिरते हैं हम और 'मुसहफ़ी' मिलता नहीं