EN اردو
मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही | शाही शायरी
masti-e-baada-e-gulfam se wabasta rahi

ग़ज़ल

मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही

अर्श सहबाई

;

मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही
ज़िंदगी रक़्स-ए-मय-ओ-जाम से वाबस्ता रही

लोग कहते हैं कि कुछ उस में मिरा ज़िक्र भी था
वो हिकायत जो तिरे नाम से वाबस्ता रही

दिल जो घबराया तो मय-ख़ाने में हम जा बैठे
हर ख़लिश बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही

उस की मजबूरी-ए-पैहम पे ज़रा ग़ौर करें
जो तमन्ना दिल-ए-नाकाम से वाबस्ता रही

'अर्श' मुद्दत हुई गो तर्क-ए-मय-ओ-जाम किए
फिर भी तोहमत ये मिरे नाम से वाबस्ता रही