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चश्म ने की गौहर-अफ़्शानी सरीह | शाही शायरी
chashm ne ki gauhar-afshani sarih

ग़ज़ल

चश्म ने की गौहर-अफ़्शानी सरीह

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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चश्म ने की गौहर-अफ़्शानी सरीह
हो गई ये हम से नादानी सरीह

मुँह छुपा क़ातिल कि तेरी ही तरफ़
तक रही है चश्म-ए-क़ुर्बानी सरीह

कर्बल-ए-इशक़ में उश्शाक़ की
तेग़ ओ ख़ंजर पर है मेहमानी सरीह

आईने में भी नहीं पड़ता है अक्स
है तिरी तस्वीर ला-सानी सरीह

ज़ाला-साँ क्यूँ-कर घुले जावें न हम
है जो आँसू में परेशानी सरीह

क्यूँकि इस्तिक़्लाल का दम मारें हम
उस्तुखाँ अपने तो हैं पानी सरीह

मज़रा-ए-दिल किस तरह सरसब्ज़ हो
बर्क़ याँ करती है जौलानी सरीह

माह-ए-नौ है किस के दर का सज्दा-पाश
रुक गई है उस की पेशानी सरीह

'मुसहफ़ी' दम तोड़े है मरता नहीं
कर रहा है ये गिराँ-जानी सरीह