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चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह | शाही शायरी
chakhi na jis ne kabhi lazzat-e-sinan-e-nigah

ग़ज़ल

चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह
मज़ा दे फिर उसे क्या तेग़-ए-ख़ूँ-चकान-ए-निगाह

जिस अंजुमन में कि पड़ता न था गुमान-ए-निगाह
पड़ा है टूट दम-ए-रक़्स आसमान-ए-निगाह

बला से उस से ही रोज़-ए-सियह का हाल कहूँ
कि मील-ए-सुर्मा है इस के मिज़ाज दान-ए-निगाह

धनक से सुरमे की चिल्ला है ता ब-गोशा-ए-चशम
कोई है सैद जो फिर ज़ह हुई कमान-ए-निगाह

बरी है वाजिब ओ मुमकिन की क़ैद से वो हुस्न
न दरमियाना-ए-मर्दुम न दरमयान-ए-निगाह

हुआ था मस्ती की मज्लिस में शब गुज़र अपना
किया नज़ारा-ए-मह्विय्यत-ए-जहान-ए-निगाह

वो आसमाँ की तरफ़ देखे गर उठा कर आँख
गिरे ज़मीन पे ईसा भी खा सिनान-ए-निगाह

न ताब नूर-ए-तजल्ली की ला सका मूसा
फ़रोग़-ए-हुस्न हुआ बाइस-ए-ज़ियान-ए-निगाह