चाहता हूँ इंतिहा-ए-दर्द-ए-दिल
मिल गई आख़िर दवा-ए-दर्द-ए-दिल
क्या ज़रूरी थी दवा-ए-दर्द-ए-दिल
सुन तो लेते माजरा-ए-दर्द-ए-दिल
इश्क़ की वज्ह-ए-नदामत कुछ न पूछ
दिल है पहलू में ब-जा-ए-दर्द-ए-दिल
जिस को दिल लेने पे इतना नाज़ है
काश होता आश्ना-ए-दर्द-ए-दिल
यूँ नहीं मिटने की 'अख़्तर' ये ख़लिश
दिल कहीं आए तो जा-ए-दर्द-ए-दिल

ग़ज़ल
चाहता हूँ इंतिहा-ए-दर्द-ए-दिल
हरी चंद अख़्तर