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चाहता हूँ इंतिहा-ए-दर्द-ए-दिल | शाही शायरी
chahta hun intiha-e-dard-e-dil

ग़ज़ल

चाहता हूँ इंतिहा-ए-दर्द-ए-दिल

हरी चंद अख़्तर

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चाहता हूँ इंतिहा-ए-दर्द-ए-दिल
मिल गई आख़िर दवा-ए-दर्द-ए-दिल

क्या ज़रूरी थी दवा-ए-दर्द-ए-दिल
सुन तो लेते माजरा-ए-दर्द-ए-दिल

इश्क़ की वज्ह-ए-नदामत कुछ न पूछ
दिल है पहलू में ब-जा-ए-दर्द-ए-दिल

जिस को दिल लेने पे इतना नाज़ है
काश होता आश्ना-ए-दर्द-ए-दिल

यूँ नहीं मिटने की 'अख़्तर' ये ख़लिश
दिल कहीं आए तो जा-ए-दर्द-ए-दिल