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बर्क़-ए-रुख़्सार-ए-यार फिर चमकी | शाही शायरी
barq-e-ruKHsar-e-yar phir chamki

ग़ज़ल

बर्क़-ए-रुख़्सार-ए-यार फिर चमकी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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बर्क़-ए-रुख़्सार-ए-यार फिर चमकी
इस चमन की बहार फिर चमकी

तू ने फिर इस को सान पर रक्खा
तेरे ख़ंजर की धार फिर चमकी

मेरे गिर्ये से आब-ओ-ताब आया
सूरत-ए-रोज़गार फिर चमकी

ख़ून-ए-आशिक़ से वो ज़ह-ए-दामन
दम-ए-शमशीर वार फिर चमकी

देखियो पाँव रख दिया किस ने
आज क्यूँ नोक-ए-ख़ार फिर चमकी

वो जो इक टीस सी है दिल में मिरे
रह के बे-इख़्तियार फिर चमकी

'मुसहफ़ी' की जो तू ने दर-रेज़ी
शायरी तेरी यार फिर चमकी