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बनाया एक काफ़िर के तईं उस दम मैं दो काफ़िर | शाही शायरी
banaya ek kafir ke tain us dam main do kafir

ग़ज़ल

बनाया एक काफ़िर के तईं उस दम मैं दो काफ़िर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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बनाया एक काफ़िर के तईं उस दम मैं दो काफ़िर
मिरे मुँह से जो निकला ना-गहाँ ओ काफ़िर ओ काफ़िर

मुसलमाँ देख कर उस बुत की सूरत को ये कहता है
मुसलमानी कहाँ की? बाँध ले ज़ुन्नार, हो काफ़िर

तुझे पर्वा नहीं हरगिज़ किसी की तू है बे-परवा
तिरे इस हुस्न-ए-काफ़िर पर परी हो जाए गो काफ़िर

शब-ए-हिज्राँ में जो दिल दम-ब-दम फ़रियाद करता है
ख़फ़ा हो कर कहूँ मैं कोई साअत तू तो सो काफ़िर

कहाँ तक ऐ दिल-ए-शोरीदा तू आँसू बहावेगा
शब आई सुब्ह होने पर बस इतना भी न रो काफ़िर

हम अपना दीन-ओ-ईमाँ पहले उस को नज़्र करते हैं
हमारे सामने इस शक्ल से आता है जो काफ़िर

तिरी बातों से तो ऐ 'मुसहफ़ी' जी अपना तंग आया
ख़ुदा के वास्ते चुप रह न मेरी जान खो काफ़िर