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बहस उस की मेरी वक़्त-ए-मुलाक़ात बढ़ गई | शाही शायरी
bahs uski meri waqt-e-mulaqat baDh gai

ग़ज़ल

बहस उस की मेरी वक़्त-ए-मुलाक़ात बढ़ गई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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बहस उस की मेरी वक़्त-ए-मुलाक़ात बढ़ गई
बातें हुईं कुछ ऐसी कि बस बात बढ़ गई

बोला न मुर्ग़-ए-सुब्ह न आई सदा-ए-आह
या-रब शब-ए-फ़िराक़ की क्या रात बढ़ गई

इस्लाह भी ज़रूरी है अब इस की शैख़-जी
दाढ़ी तुम्हारी क़िबला-ए-हाजात बढ़ गई

पहुँचे था अपना दस्त-ए-हवस जिस पे गाह गाह
वो शाख़-ए-मेवा-दार भी हैहात बढ़ गई

शिमला रखा जो दोश पे लंगूर की सी दुम
क्या इस में शैख़-जी की करामात बढ़ गई

जिस दिन से उन पे पर्दा-ए-पोशीदगी पड़ा
उस दिन से क़द्र-ए-आलम-ए-जिन्नात बढ़ गई

दीं गालियाँ जो तू ने सनम इक ग़रीब को
क्या गालियाँ दिए से तिरी ज़ात बढ़ गई

दे 'मुसहफ़ी' को नेमत-ओ-दौलत तू ऐ करीम
ता सब कहें कि उस की अब औक़ात बढ़ गई