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'अंजुम' पे जो गुज़र गई उस का भला हिसाब क्या | शाही शायरी
anjum pe jo guzar gai us ka bhala hisab kya

ग़ज़ल

'अंजुम' पे जो गुज़र गई उस का भला हिसाब क्या

सूफ़िया अनजुम ताज

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'अंजुम' पे जो गुज़र गई उस का भला हिसाब क्या
पूछे कोई सवाल क्या लाएँगे हम जवाब क्या

ख़ून-ए-दिल-ओ-जिगर से है हुस्न-ए-ख़याल हुस्न-ए-फ़न
इस के बग़ैर शेर क्या मजमूआ क्या किताब क्या

तेरा ही नाम ले लिया वक़्त-ए-इशाअत-ए-कलाम
इस के अलावा और हम ढूँडते इंतिसाब क्या

तेरी ही बे-रुख़ी से तो टूटा है दिल अभी अभी
अब इलतिफ़ात-ए-बे-महल हो सके कामयाब क्या

हम तो चमन चमन गए दिल न शगुफ़्ता हो सका
नसरीन-ओ-नस्तरन है क्या लाला है क्या गुलाब क्या

तुम को भी रंज इसी से है हम भी कुछ इस से ख़ुश नहीं
और ख़राब इस से भी होगा दिल-ए-ख़राब क्या

'अंजुम' ने आँख खोल के दर्द-ओ-अलम जो देखे हैं
औरों ने ख़्वाब में अगर देखे तो ऐसे ख़्वाब क्या