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अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़ | शाही शायरी
amal sen mai-paraston ke tujhe kya kaam ai waiz

ग़ज़ल

अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़

सिराज औरंगाबादी

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अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़
शराब-ए-शौक़ का तू ने पिया नीं जाम ऐ वाइ'ज़

लगेगा संग-ए-ख़जलत शीशा-ए-नामूस पर तेरे
अबस हम बे-गुनाहों कूँ न कर बद-नाम ऐ वाइ'ज़

नहीं है इम्तियाज़-ए-नेक-ओ-बद चश्म-ए-हक़ीक़त में
मुझे यकसाँ हुआ है कुफ़्र और इस्लाम ऐ वाइ'ज़

नियाज़-ए-बे-ख़ुदी बेहतर नमाज़-ए-ख़ुद-नुमाई सें
न कर हम पुख़्ता-मग़्ज़ों सें ख़याल-ए-ख़ाम ऐ वाइ'ज़

कलाम-ए-नुक़्ता-ए-इल्म मुख़्तसर है सब मआनी का
बयान-ए-मंतिक़-ए-दर्सी कूँ नीं अंजाम ऐ वाइ'ज़

वो शीरीं-लब की कड़वे बोल अमृत हैं मिरे हक़ में
तुझे मालूम क्या है लज़्ज़त-ए-दुश्नाम ऐ वाइ'ज़

'सिराज' उस काबा-ए-जाँ के तसव्वुर कूँ किया सुमरन
यही विर्द-ए-सहर है और दुआ-ए-शाम ऐ वाइ'ज़