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अक्स कोई किसी मंज़र में न था | शाही शायरी
aks koi kisi manzar mein na tha

ग़ज़ल

अक्स कोई किसी मंज़र में न था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

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अक्स कोई किसी मंज़र में न था
कोई भी चेहरा किसी दर में न था

सुब्ह इक बूँद घटाओं में न थी
चाँद भी शब को समुंदर में न था

कोई झंकार रग-ए-गुल में न थी
ख़्वाब कोई किसी पत्थर में न था

शम्अ रौशन किसी खिड़की में न थी
मुंतज़िर कोई किसी घर में न था

कोई वहशत भी मिरे दिल में न थी
कोई सौदा भी मिरे सर में न था

थी न लज़्ज़त सुख़न-ए-अव्वल में
ज़ाइक़ा हर्फ़-ए-मुकर्रर में न था

प्यास की धुँद भी होंटों पे न थी
ओस का क़तरा भी साग़र में न था