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अजब अहवाल देखा इस ज़माने के अमीरों का | शाही शायरी
ajab ahwal dekha is zamane ke amiron ka

ग़ज़ल

अजब अहवाल देखा इस ज़माने के अमीरों का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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अजब अहवाल देखा इस ज़माने के अमीरों का
न उन को डर ख़ुदा का और न उन को ख़ौफ़ पीरों का

मिसाल-ए-महर-ओ-मह दिन रात खाते चर्ख़ फिरते हैं
फ़लक के हाथ से ये हाल है रौशन-ज़मीरों का

क़फ़स में फेंक हम को फिर वहीं सय्याद जाता है
ख़ुदा हाफ़िज़ है गुलशन में हमारे हम-सफ़ीरों का

मुझे शिकवा नहीं बे-रहम कुछ तेरे तग़ाफ़ुल से
खुले-बंदों फिरे तू हाल क्या जाने असीरों का

दिल-ए-याक़ूत है तुझ लाल-ए-लब के रश्क से पुर-ख़ूँ
तिरे दंदाँ के आगे घट गया है मोल हीरों का

किया है उस निशाँ-अंदाज़ ने तरकश तही मुझ पर
मिरी छाती सिरा हो जिस उपर तोदा है तीरों का

हमें दीवान-ख़ाने से किसी मुनइम के क्या 'हातिम'
है आज़ादों के गर रहने को बस तकिया फ़क़ीरों का