ऐ ग़म-ज़दा ज़ब्त कर के चलना
हर गाम ठहर ठहर के चलना
अंदाज़ ग़ज़ब है ये बुतों का
हाथों को कमर पे धर के चलना
जाते हुए उस गली से हम को
हर गाम इक आह भर के चलना
ऐ कब्क कहाँ तू और वो रफ़्तार
पावेगा न ऐसा मर के चलना
ऐ 'मुसहफ़ी' क्यूँ दबूँ न उस से
आशिक़ का है शेवा डर के चलना
ग़ज़ल
ऐ ग़म-ज़दा ज़ब्त कर के चलना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

