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अब मुझ को गले लगाओ साहिब | शाही शायरी
ab mujhko gale lagao sahib

ग़ज़ल

अब मुझ को गले लगाओ साहिब

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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अब मुझ को गले लगाओ साहिब
यक शब कहीं तुम भी आओ साहिब

रूठा हूँ जो तुम से मैं तो मुझ को
आ कर के तुम्हीं मनाओ साहिब

बैठे रहो मेरे सामने तुम
अज़ बहर-ए-ख़ुदा न जाओ साहिब

कुछ ख़ूब नहीं ये कज-अदाई
हर लहज़ा न भौं चढ़ाओ साहिब

रखते नहीं पर्दा ग़ैर से तुम
झूटी क़स्में न खाओ साहिब

दर-गुज़रे हम ऐसी ज़िंदगी से
इतना भी न जी जलाओ साहिब

या ग़ैर की चाह भूल जाओ
या दिल से हमें भुलाओ साहिब

तुम वक़्त के अपने हो मसीहा
मुर्दे के तईं जिलाओ साहिब

मियाँ-'मुसहफ़ी' यार आ मिलेगा
इतना भी न तिलमिलाओ साहिब