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आतिश-ए-ग़म में बस कि जलते हैं | शाही शायरी
aatish-e-gham mein bas ki jalte hain

ग़ज़ल

आतिश-ए-ग़म में बस कि जलते हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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आतिश-ए-ग़म में बस कि जलते हैं
शम्अ साँ उस्तुख़्वाँ पिघलते हैं

वही दश्त और वही गरेबाँ चाक
जब तलक हाथ पाँव चलते हैं

देख तेरी सफ़ा-ए-सूरत को
आईने मुँह से ख़ाक मलते हैं

जोशिश-ए-अश्क है वो आँखों में
जैसे उस से कुएँ उबलते हैं

देख आरिज़ को तेरे गुलशन में
सैकड़ों रंग गुल बदलते हैं

शोख़-चश्मी बुताँ की मुझ से न पूछ
कि ये नज़रों में दिल को छलते हैं

देखियो शैख़ जी की चाल को टुक
अब कोई दम में ये फिसलते हैं

बिन लिए काम दिल का उस कू से
'मुसहफ़ी' हम कोई निकलते हैं