क़ाफ़िले रात को आते थे उधर जान के आग
दश्त-ए-ग़ुर्बत में जिधर ऐ दिल-ए-सोज़ाँ हम थे
तअशशुक़ लखनवी
मौज-ए-दरिया से बला की चाहिए कश्ती मुझे
हो जो बिल्कुल ना-मुवाफ़िक़ वो हवा पैदा करूँ
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से क्या पूछते हो दाग़ हैं दिल में कितने
तुम को अय्याम-ए-जुदाई का शुमार आता है
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से लाखों ख़ाक के पुतले बना सकता है तू
मैं कहाँ से एक तेरा सा ख़ुदा पैदा करूँ
तअशशुक़ लखनवी
मुझे है फ़िक्र ख़त भेजा है जब से उस गुल-ए-तर को
हज़ारों बुलबुलें रोकेंगी रस्सी में कबूतर को
तअशशुक़ लखनवी
मुंतज़िर तेरे हैं चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ खोले हुए
बैठे हैं दिल बेचने वाले दुकाँ खोले हुए
तअशशुक़ लखनवी
नज्द से जानिब-ए-लैला जो हवा आती है
दिल-ए-मजनूँ के धड़कने की सदा आती है
तअशशुक़ लखनवी
पड़ गई क्या निगह-ए-मस्त तिरे साक़ी की
लड़खड़ाते हुए मय-ख़्वार चले आते हैं
तअशशुक़ लखनवी
वो इंतिहा के हैं नाज़ुक मैं सख़्त-जाँ हूँ कमाल
अजब तरह की मुसीबत पड़ी है ख़ंजर पर
तअशशुक़ लखनवी

