क्या किसी से किसी का हाल कहें
नाम भी तो लिया नहीं जाता
निज़ाम रामपुरी
न बन आया जब उन को कोई जवाब
तो मुँह फेर कर मुस्कुराने लगे
निज़ाम रामपुरी
मुंतज़िर हूँ किसी के आने का
किस की आँखों में आ के ख़्वाब रहे
निज़ाम रामपुरी
मेरे मिलने से जो यूँ हाथ उठा-बैठा तू
नहीं मालूम कि दिल में तिरे क्या बैठ गया
निज़ाम रामपुरी
मज़मून सूझते हैं हज़ारों नए नए
क़ासिद ये ख़त नहीं मिरे ग़म की किताब है
निज़ाम रामपुरी
मंज़ूर क्या है ये भी तो खुलता नहीं सबब
मिलता तो है वो हम से मगर कुछ रुका हुआ
निज़ाम रामपुरी
मैं न कहता था कि बहकाएँगे तुम को दुश्मन
तुम ने किस वास्ते आना मिरे घर छोड़ दिया
निज़ाम रामपुरी
लिपटा के शब-ए-वस्ल वो उस शोख़ का कहना
कुछ और हवस इस से ज़ियादा तो नहीं है
निज़ाम रामपुरी
ख़ुश्बू वो पसीने की तिरी याद न आ जाए
गुल कैसा कभी इत्र भी सूँघा न करेंगे
निज़ाम रामपुरी

